आज की हाई-फाई और वाई-फाई पीढ़ी को पता नहीं है कि हमारे समय में कंप्यूटर की कैसी-कैसी तकनीकें हुआ करती थीं!
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जैसे ही पापा के दो थप्पड़ गिरे या स्कूल में मास्टर कान लाल करें, हमारा पूरा ‘सिस्टम रीस्टार्ट’ होता था
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यह हमारा ‘फ्री डाउनलोड’ था जब हम घर का काम नहीं कर रहे थे और इसे उल्टा करके दूसरे लोगों के नोटों से फाड़ देते थे!
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लखोटी, गिल्ली-डंडा, कुकरी, गेंद, बल्ला, ताश, भृंग… ये सब थे हमारे ‘गेमिंग ऐप’!
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शादियों में दाल परोसने का मौका, अवकाश में नोट्स देने का मौका, और हवा खत्म होने पर लड़की की साइकिल भरने का मौका … ये सभी ‘डेटिंग ऐप्स’ थे!
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और स्कूल के बाद परिसर की पिछली दीवार, शादी में वाडी के पीछे, बाजार में आइस बॉल ट्रक और एक सस्ते रेस्टोरेंट का फैमिली रूम… ये सब हमारे ‘चैटिंग रूम’ थे!
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विद्या भारती, रेडियो सीलोन, ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस… ये सब थे हमारे ‘ऑनलाइन लाइव म्यूजिक ऐप’!
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और 20-25 रुपये के जो ऑडियो कैसेट हम चुनिन्दा गानों को रिकॉर्ड करते थे वो थे हमारी ‘म्यूजिक फाइल्स’!
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नायक-नायिकाओं की तस्वीरें, रंगीन पिक्चर फ्रेम, लेख, बैज… ये सब हमारी ‘कैश-लेस करेंसी’ थी!
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वो लड़का जिसे पता चल जाता है कि हमारी मनपसंद लड़की कहाँ रहती है, पापा क्या करते हैं, लड़की घर में अकेली हो तो फ़ोन नंबर क्या होता है.. वो था हमारा ‘गूगल सर्च इंजन’! घोषित करना
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टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलने वाला चोर-पुलिस हमारा ‘PUBG’ गेम था और गप्पे मारने वाले हमारा ‘कैंडी क्रश’ गेम था!
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और अंत में… फ्री पीरियड्स में या स्कूल ट्रिप पर जो अंतकड़ी खेलता था वो हमारा ‘इंडियन आइडल’ था…

और स्कूल के अजीबोगरीब उस्ताद और हमारे ‘कॉमेडी सर्कस’ के उस्ताद!

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